संदेश

"खुद से हुई एक मुलाक़ात"

आज तन्हा अकेला वक़्त मिला तो खुद को सोचने लगा, कहेते है जब आदमी अकेला होता है तो खुद के बोहोत करीब होता है, मौका सही था तो सोचा खुद से चार बातें कर लूँ, कुछ सवाल कर लूँ कुछ जवाब माँग लूँ, पर जब खुद को सामने रखा और बैठा...तो कुछ ना पाया...मैं भी चुप था और वो भी...सन्नाटा सा छा गया...मैं भी कुछ कहेने को ढूड़ रहा था और वो भी....ना कोई अल्फ़ाज़ मेरे पास था ना उसके पास, मानो एक पारदर्शी काँच की कोई सतेह हो मेरे सामने....जो होकर भी वहाँ नही था, बस मन व्याकुल हो उठा...सोचने लगा की ये क्या कर रहा हूँ मैं...वक़्त खराब तो नही कर रहा मैं इस बेफ़िजूली के काम में. फिर मैने उस परिस्थिति को नकार दिया, मैने उसे अनदेखा कर दिया जो मेरे सामने था...और राहत फ़तेह अली ख़ान जी के द्वारा गाया हुआ एक गाना गुनगुननाए लगा, मैने लगभग आधा गाना ख़तम कर दिया पर अभी भी वो चुप था...बस मुझे बिना किसी भाव के साथ देख रहा था...जैसे उसे कुछ सुनाई ही ना दे रहा हो...बहेरा हो...कुछ ना कह रहा था वो...मानो गूंगा भी हो...पर बस कुछ है वहाँ...मैं उसके आर पार देख सकता था...उसके पीछे कुछ नही छुप रहा था... मैं फिर चुप हो गया...और...

"गुड़िया"

एक गुड़िया की कहानी है ये, गुड़िया...जो किसी उम्मीद की गुलाम नही, जो सपनो की छोटी छोटी सी पर्चियाँ बनाकर, उनसे खेला करती है, इंद्रधनुष से रंग चुरा कर, ख्वाबों की तवीरें बनाती है ये गुड़िया, सूनेपन के साज़ पर गुनगुनाती, मुस्कुराती, अठखेलिया करती, अपने अरमानो की ठंडक में सिमटी, गर्म उजालों सी उजली, मैने अक्सर उसे फूंको से ज़ज्बात बुझाते देखा है, ज़िंदगी की धीमी सी मद्धम सी लॉ में मुस्कान के गर्म गर्म पोए पकते देखा है, एक ऐसी गुड़िया जो खामोसी में भी आवाज़ सुना करती है, चुप्पी से अल्फ़ाज़ बुना करती है, कल कल करती किसी नदी की एक तस्वीर, जिसकी गोद में सूरज भी शीतल हो विलीन हो जाता है, सूखे हुए दरख़्त के गर्त में, खिलती मुस्कुराती एक कली के जैसी, या आगन में सुबहा चढ़ती हुई धूप के जैसी, जिसके स्पर्श भर से ही, आगन की क्यारी में बंद मुरझाई पड़ी रिश्तों की कोंपलें खिल उठती हैं.

"चाह"

हमने कभी तारों से रौशन राह ना चाही थी, पर जिंदगी इस कदर भी काली स्याह ना चाही थी, कोयलों की कूक से आँखे चमकती थीं, गूँजती हमने किसी की आह ना चाही थी, सोचता था उलझनो से जूझ ही लूँगा, इस कदर उनकी नज़र बेपरवाहा ना चाही थी, गाओं की गलियों को छोड़ा गाओं जब छोड़ा, शहेर की हर एक सड़क गुमराह ना चाही थी आदतन जो पूछ बैठे हाल साहब का, शुक्रिया तो ना सही, दुत्तकार ना चाही थी.

नाम बताएँ आप का ?

ज़िक्र फिर हो चला है उसी बात का, मुस्कुराती हुई एक हँसी रात का, हम तमाशा हुए अपने जज़्बात का, हाल कैसे कहूँ ऐसे हालात का, बेफ़िज़ूली के आलम कही रह गये, अब मुसाफिर हूँ मैं अपने आगाज़ का, फिर उठाया है हुमको किसी शोर ने, आप आलम बताएँ गई रात का, खुद पे पहेरा लगाए हुआ क्या भला, सोच आज़ाद पंछी है आकाश का, कोई चर्चा नही सब हैं चुप क्यों भला. कोई भेद खोलो किसी राज़ का, जो हुआ बेदखल घर से रुसवा ना हो, आज घर हो चला आस्तीन साँप का, अपने होने का हुमको गुमाँ तब हुआ, जब पूंछा उन्होने "नाम क्या है आप का".

छोटी सी बात

क्यों छोटी सी बात लिए फिरता है तू, लम्हों की खैरात लिए फिरता है तू, पतझड़ में विकराल विटप ने भी अपने पत्ते त्यागे, सावन की सौगात लिए फिरता है तू, देखो क्या सैलाब उठा है, तिनका तिनका बह जाए, रिमझिम से ज़ज्बात लिया फिरता है तू, मतलब हो बेमतलब हो, उनकी रुतबा और हुआ, बिन बातों की बात लिए फिरता है तू, मतलब की दुनिया ये सारी, किसने किसके घाओ भरे, सीने पर आघात लिए फिरता है तू, क्यों छोटी सी बात लिए फिरता है तू

बुढ़िया

वो बुढ़िया आगन की तचती धूल में उकरू बैठी थी, घुटनो पर माथा टिकाया हुआ था, और दोनो हाथों के पंझो को मिट्टी में धाँस रखा था, रूखे पत्थर हो चुके हाथों को, वो काली मिट्टी की तचन भी, ठंडी बर्फ सी महेसूस हो रही थी, अपनी नाक से टपकते पसीने की बूँदों को गर्म सतेह पर गिर, पानी से भाप होते हुए देखती वो बुढ़िया, कुछ ही वक़्त में उन पसीने की बूँदों की तस्वीर बनने वाली थी, धुआँ होने वाली थी, पचानवे साल की पीठ तोड़ देने वाली उस उम्र के कितने ही टुकड़े हुए, पहेला टुकड़ा जब जन्म लिया और एक लड़की की देह धरी, दूसरा टुकड़ा आठ साल की उम्र में, जब लगन हुआ, और स्कूल बॅग, किताबों, दवात और कलम की जगह, तहेज़ीब, रीति, रिवाज टिका दिए गये उन कंधों पर ढोने के लिए, तीसरा टुकड़ा जब उम्र से पहेले ही गर्भ धरा, और चौथा जब अल्पविकसित जन्मी बcची की साँसों को, खटिया के मचवे तले दबा दिया गया, चार दीवारी में चॉखट से लटके पर्दों के पीछे से, धुंधली सी दुनिया को देखती वो दो आँखें भी धुँधला गयीं, चूल्‍हे पर धधकते लक्कड़ को बालते बालते, जिंदगी कब मोम सी पिघल गई पता ही ना चला, और एक दिन उन घुटनो ने दम तोड़ दिया, कूल्हे मे मची उस ...

'उलझन'

वो पतंग के माँझे सी उलझी उलझन, जितना भी सुलझाना चाहा उतनी ही और उलझ गई, क्या कहूँ उंगलियाँ औट कटवा बैठा, और एक दिन ऊभ कर पतंग के शॉक और उस डोर, दोनो से मैने तौबा कर ली, और मुड़कर फिर कभी, उन सीढ़ियों की ओर नही देखा जो छत तक जातीं थी, और अब कोई बसंत मेरे आगन नही आता, अब तो बस सन्नाटे गुनगुनाते हैं, पतझड़ मुस्कुराते हैं, अक्सर वो हुए पर सवाल तो उठते हैं, कुछ टूटे ख्वाब से घुट-ते हैं, जब भी यादों के धागों में कोई किस्सा पिरोता हूँ, तृष्णाओ के बीज फिर से बोता हुँ, तो बस क्या था, मैने खुद को कहीं रख दिया, और भूल गया, भूल गया वो सेहेर जिसका सूरज कभी कोई चहेरा होता था, भूल गया वो मेरे सुकून का दरिया तो तुझमें बेहेता था, और बन गया एक परछाई, जिसका कोई चहेरा ना था.

"जीना भी जंग सा"

ये जीना भी क्यों है जंग सा, खुद का ही ये लिबास, क्यों है मुझको तंग सा, बाबा की उलझन ध्यान दिया जाए ना, खुदा भी बदलता है अब तो रंग सा, उलझी सी उलझन, बेक़रार बेक़ारारी, हर दिल में छिड़ा है, गम और खुशी का रंज सा, सब साथ लिए बैठा क्या ढूड्ता है राही, मेरा "मैं" भी मुझसे दंग सा, है ये बुत्फक़ीरि, है या बुतपरस्ती, है समतल पे बैठा, कुआँ ढूड्ता है,, अजब है खुदाई का ढंग सा, ये जीना भी क्यों है जंग सा.

'वो तुम थे'

इस समाज की परंपराओं के, धारणाओ के, ना जाने कई बाँध लाँघे मैने, हौसला तुम थे, खुद से ना जाने, कई सौदे कई सवाल, और हुआ जो एक फ़ैसला, तुम थे, सुलगती खाहिशों ने मेरा दामन जला डाला, मेरी वो बेपरवाह ज़िद भी तुम थे, उस ज़िद की हद भी तुम थे, मेरी पथराई आँखों से अब बह चुका सागर, मुझे रोने की खाहिश थी, मगर कुछ अश्क कम थे, सिसकती चौखट वीरान, उड़े फरियाद के पंछी, ज़मीन पर जर्द पत्ते सा बचा एक नाम, हम थे.

ILLUSION of LIFE

नज़र से परे नज़र कुछ नही आता, बोहोत कुछ आता है, मगर हुमको कुछ नही आता, अपनी हसरत को इस उम्मीद में मीनार कर लिया, कुछ तो भाए गा, मगर हुमको कुछ नही भाता.

"बचपन"

आज सोचता हूँ, के एक उम्र वो थी, जहाँ हर् पल हस्ता था....हर् पल खिलखिलाता था..... कितना चैन, कितना सुकून..... मछली पकड़ने के कांटे....तो कभी कढाई वाली सुई का कितना जूनून, नानी जी के पानदान से सुपारी चुराना, वो मिटटी के टेलेफ़ोन से दिल लुभाना, पीपल के पत्तों पर चटकारे लेती...वो मटर की चाट, पोर के पास खटिया पर धीरे-धीरे सुलगती...वो जाड़ों की रात, आम के बाग़ में...सीपियों के पीछे भागते वो नन्हे कदम, चोपी और बबूल के काँटों के कुछ रिस्ते जखम, नदी के ऊपर मंडराती...टिटिहिरी की आवाजें, वो सपनों में होती...कोयल से बातें, छोटी सी बात पर यूँ सिसक कर रो देना, मिटटी लगे दो गालों को... आंसुओं से भिगो देना, वो बापू की बातों को गौर से सुनना, वो दाई का चावल से तिनकों को चुनना, खर्भुजाना के पेंड पर...तचती वो दोपहर, चाची की ठनकती थाली से...अंगडाई लेती वो सेहर, वो कुँए वाली बुढ़िया की...डरावनी सी बातें, डर के रजाई में सिमटती....वो ठंडों की रातें, वो प्यारी सी चिड़िया...वो गंदा सा बाज़, बग्गर में छुपे हुए...उन पिल्लों का राज़, और नदी वाले जंगल से आती....सियारों की आवाज़, गिट्टी फोड़, लापचुआ और गुट्टे का खेल, काज़...

"हर् कोई एक में ही तमाम मिलता है"....

हर् कोई एक में ही तमाम मिलता है, जहाँ भी नजर डाली, जमीं से जुडा हुआ एक आसमान मिलता है, गुनाहों पे उनके उन्हें बच्चा न बोलो, नादान सी बातों में सारा जहाँ मिलता है, आओ गाँव वालों अपनी फसलें बचाओ, ठाकुर जी का घोडा बेलगाम मिलता है, कितना पुकारा प्रभु तुम क्यों ना आये, हर् कोई जपता यहाँ राम-राम मिलता है .

" I " an Article

"I" I am right, I did not do anything wrong, I am this, I am that and God knows what. Almost everyone keeps living in this bubble of " I ", which they have created around themselves, sometimes this "I" finds itself on the last seat of the Bus, sometimes walking in the middle of the market, sometimes feeling shy being falling on the road, and sometimes this "I" is with Bus conductor when caught without ticket. SO many " I's "......" I " in every person. Every person tries to represent his " I " from with in his own limited sphere of thoughts, and actually this " I " pushes us to present our self to the surroundings. A mind evolving on the bases of some orthodox definitions, which have created the structure of our society, always finds it very difficult to see beyond these high walls. For an Example:- A potter gives a Pot its shape and from this shape it gets its definition, and its called...

"दिल के बोल"

देखो जिंदगी ख़ाक हुई ना, फिर वोही बात हुई ना, एक रिश्ते से खिलवाड़ किया, जो टूटा तो आवाज़ हुई ना, माना के वो दिन गुलशन थे, अब् पतझड़ हर् एक रात हुई ना, दिल-ए-नादाँ को सुकून मिला ना, बेचैनी बिन बात हुई ना, ना कुछ सोचा ना कुछ भाला, एक चिंगारी से आग हुई ना, एक हाड़ मॉस की लड़की को, तुम खुदा नवाज़ा करते थे, लो अब् वोही जल्लाद हुई ना।

ग़ज़ल

हमको ये रिश्ते निभाने नहीं आते, इन आँखों को झूट छुपाने नहीं आते, कितना भी थामों फ़साने छूट जाते हैं, इन होठों को जाल बिछाने नहीं आते, हमने नयी रस्मों को ढोया बोहोत है, क्यों लौट कर रिश्ते पुराने नहीं आते, तकदीर में मेरी राह वो क्यों लिखी, जिस राह से लौट कर दीवाने नहीं आते, कुछ सोचा समझा और बस इनकार कर दिया, यूँ रेत के घर हमें बनाने नहीं आते, महेफिल में हमको ताकती नजरें, कुछ पल ठहर कर गुज़र गयीं, इन नज़रों को तीर के निशाने नहीं आते, इस कशमकश के भवर में कब तक रहोगे, क्यों तैर कर दरिया किनारे नहीं आते।

"मेरे दोस्त"

तुम सब हो तो बहाना है, वक़्त के दामन से एक मुस्कान चुरा लूँ, जिंदगी के इस मोड़ से गुजरते हुए, एक छोटा सा मीठा सा किस्सा उठा लूँ, ये धीरे धीरे जलती जिंदगी की लौ में, लम्हे मोम की तरह पिघलते हैं, कितना भी थामों इन्हें, हाथों से रेत की तरह फिसलते है, हाथों से फिसलती इस रेत का, एक छोटा सा यादों का घर ही बना लूँ, तुम सब हो तो बहाना है, वक़्त के दामन से एक मुस्कान चुरा लूँ।

ग़ज़ल

बेवजह बिंबात कोई गम सा है, हर् लम्हा भीगा सा है, हर् लम्हा नम सा है, आरजुओं के बादल ,रह रह कर घिर आतें हैं, कितना कुछ है, फिर भी कम सा है, नजर फकीर की देखा, तो सब हमशक्ल दिखते हैं, वो कोई गैर भी, हूबहू हम सा है, खिलाड़ी ताश के पत्तों को कुछ ऐसे घुमाता है, तमाशाई इन्सान, कभी बदिश, कभी गुल्लू, कभी दुक्की, कभी बेगम सा है।

ग़ज़ल

हाँ मुझे गुमनाम रहेने दो, इस शक्शियत को आम रहेने दो, इन खाहिशों के दलदलों ने दम निकाला, बस अब् कोई आगाज़ रहेने दो, अब् कोई अंजाम रहेने दो, इंसानियत काफी, खुदा बनकर क्या करना, तुम बस मुझे इन्सान रहेने दो, हमने आधी उम्र भर सूरज उठाया है, अब् कुछ दिनों की शाम रहेने दो।

"बेबस उजाले" ग़ज़ल

उजाले बेबस से हैं अँधेरे गाँव में, धुप नहीं रिसती जाड दरख्तों की छाओं में, बे-क्स परिंदे सय्याद के हमनफस हो बैठे, ये कौन सा रंग बिखरा है आबो-फिजाओं में, फरमान-ए- क़त्ल-ए-आम को एहेतेसाब कौन करे, खुदा-ए-वलायत जो ठेहेरी, बड़े शौक से क़त्ल होतें हैं, क्या खूब तिलिस्मियत है उनकी निगाहों में।

तिनका

हर् रोज़ कुछ सोचता हूँ, हर् रोज़ कुछ पन्ने भरता हूँ, इस गुमनाम माहौल को नाम देती कुछ लकीरें हर् रोज़ पन्नों पर खिचती हैं, कभी यूँ ही बैठे हुए कहीं किसी बस स्टॉप पर खड़े कुछ धुन्द्लाये से चहरे याद आ जाते हैं, तो कभी फुटपाथ पर भागते हुए कुछ क़दमों की आहट घर की सीढियों पर दौड़ जाती है, कभी फ़ोन पर कुछ पुराने दोस्तों से बात करते हुए आज की कुछ नई बातें होटों पर मचल उठतीं हैं, तो कभी रात खाब में कुछ बीती हुई बातें पलकों पर बिजली के जैसे कौंध जाती हैं, कभी कोई बात हुई तो हलकी सी मुस्कान छिटक जाती है चहरे पर, तो कभी किसी मंजर से दिल घबरा उठता है। साथ के कुछ नए चेहेरों के साथ बैठ कर अक्सर यूँ ही बिन्बात हसना, तो कभी मिले वक़्त कमरे के किसी कोने में बैठ कर कुछ अपनों को याद कर रोना और मुस्कुराना, बस यूँ ही हर् दिन गुजरता है, वक़्त की बहेती हवाओं के साथ किसी सूखे हुए तिनके की त रा बस बह रहा हूँ, हज़ारों सवालों के साथ, बेचैन अकेला, यूँ तो सहारा है कुछ अपनों का, और कुछ ख्वाब साथ हैं, जो अपने होकर भी अपने नहीं, जो पास होकर भी पास नहीं, एक धुंदली सी उम्मीद है इन निदासी आखों में, जो आगे चलने को मजबूर सा ...