संदेश

"ना चीरहरण कर भारत का"

ना चीरहरण कर भारत का, ना सूर्यग्रहण कर भारत का, तू बना क्लिस्ट दुर्गम पथ को, ना लहू चरण कर भारत का, रुक अग्य मूर्ख किस ओर चला, एक और सदन को फूक जला, ना लॅंक दहन कर भारत का, ना सूर्यग्रहण कर भारत का, हठ ठान विशुद्ध विचारों का, हठ ठान नीरवता नारों का, तू राग अमन कर भारत का, ताप पॅशचताप का अग्निकुण्ड, जप मन्त्र यशाश्वी महापुंज, तू आज हवन कर भारत का, उँचा उठ ज्यों हिम अडिग खड़ा, हर दूषड़ता की बली चढ़ा, तू मुक्त गगन कर भारत का, तू आज नमन कर भारत का.

Safety Of Women In India

Safety Of Women In India :- The reason I am here today is to talk about “The safety of women in India” w.r.t to rapes and other inhuman activities that Indian women suffer from today. Even if one circumvents the obviousness of such primitive occurrences during the past history, one is baffled by its presence in modern times boasting of increased awareness, education and feminism. I will also talk about an infamous Rape incident which brought shiver down the spines of many. Well we all know about the brave story of 23 year old girl ‘Nirbhaya’ who was brutally raped by 6 men in our nation’s capital on 16th December 2012. The girl was finally killed by lethal wounds provided by the rapists; what ever happened to the innocent girl on that night will stay fresh in the hearts of many. Here the question is not for the court to decide on the people found guilty, but the question is for the future of our country, this incident highlights that the country’s social, legal and political co...
आज का भारत" (Delhi gang-rape) हवस की बाढ़ में है बह रहा आवाम, नज़र से बह रहे दो धार आँसू कौन देखेगा, जला कर घर हथेली सेकने का दौर आया है, सुलगते रह गये अरमान पानी कौन फेकेगा, कोई खूनी लिए खंजर सियासत का रहनुमा है, वोही क़ातिल वोही मुक़बीर, मुक़दमा कौन जीतेगा, मालिक की वाह वही में वो कुत्ता शेर बन बैठा, दाँतों लगा जो खून अब तो माँस नोचेगा, किलसती आबरू उसकी है घायल जिस्म भारत का, हुए मुर्दे सभी, रोएगा छाती कौन पीटेगा.
"ऊटी" किसी मखमली रेशमी कपड़े पर पड़ी सिलवटों सी, पहाड़ों की वो परतें, हरी सुनेहरी चादर में लिपटे उथले पुथले वो मैदान, चाय के बाग़ीचे और उनपर गुटों में खड़े युकलिप्टस के पतले संकरे पेंडो की श्रखलाएँ. घिरता हुआ कोहरा और किसी दूर धुन्द्ले से पहाड़ के पीछे बुझता हुआ दिनभर की थकान से चूर वो सुर्ख नारंगी सूरज जिसकी किर्णो से रंग सोखते वो बिखरे हुए बादलों के कुछ टुकड़े और उनके पीछे कहीं छुपा हुआ धूमिल सा एक चाँद. ये सब देखकर कभी तो याद आ रहा था बचपन का वो मेला जहाँ एक जादूगर जादू दिखाया करता था. कभी रुमाल से कबूतर निकाल दिया करता था, तो कभी हैट से खरगोश, और मैं बस भवचक्का सा रह जाता था. तो कभी याद आ रहा था वो रंगमंच, एक सधा हुआ नाटक, अपनी अपनी भूमिका को बखूबी निभाते हुए सभी कलाकार. और हम थे दर्शक अपने-अपने कमेरो के साथ इंतेजर में की कब कोई पंछी या पानी का बुलबुला फ्रेम में आए और फोटो क्लिक किया जाए. कई पल फ्रेम में क़ैद हुए कई तस्वीरें खीचीं गयीं और फिर उस नाटक का अह: पात्र वो सुर्ख नारंगी सूरज उस बड़े काले पहाड़ के पीछे कहीं खो गया. रंगमंच का परदा गिर गया और दर्शक मुड़...

मकड़ी का जाल और पतंगा

आज सुबहा साइकल से ऑफीस जाते हुए मैं एक लाल-बत्ती पर रुका हुआ था, और इतने में ही मेरी नज़र पास ही खड़े एक बिजली के खंभे पर एक मकड़ी के द्वारा बुने हुए जाल पर पड़ी, जिसमें ना जाने कई पतंगे फँसे हुए थे, कुछ दम तोड़ चुके थे और कुछ अभी भी पंख फड़फड़ा रहे थे, उन्हे देखकर मुझे खुद में और उन पतंगों में कुछ खास अंतर नही दिखा, मानो वो मुझे मेरी ही तस्वीर दिखा रहे हों. मैं उन पतंगो को कुछ देर यूँ ही देखता रहा, के तभी बत्ती हरी हो गई और मैं अपनी राह चल पड़ा. शाम को ऑफीस से लौट-ते हुए भी मैं उस ही रास्ते से गुजरा और मेरी नज़र फिर वहीं बिजली के उस खंभे पर चली गई, मैने देखा की कुछ पतंगे रोडलाइट की रॉशनी में वहीं उस मकड़ी के जाले की आसपास भिनभिना कर उस जाल में फँसते जा रहे हैं. मानो ये पतंगे भी अपनी आदत से मजबूर हैं, जाने ईस्वर ने इन्हे रचा ही इसलिए है. मैं भी इन पतंगों की तरह ही खुद को अपनी आदत से मजबूर सा समझता हूँ, मैं भी किसी रॉशनी को देख उसकी ओर बढ़ता हूँ, मुझे वो रॉशनी तो दिखती है पर उसके पीछे का अंधेरा और उस अंधेरे में बुना हुआ जाल नही. मैं बेबस ही उस ओर बढ़ता हूँ और जल्द ही खुद को एक जा...

The Amazing Spider-Man 3d

बीते शुक्रवार ही प्रकाशित हुई इस फिल्म का ज़िक्र पिछले कई दिनो से मेरे ऑफिस में चल रहा था... ऑफिस से कई लोगों ने "उर्वशी" थियेटर में शुक्रवार रात 9:30 के स्पाइडर-मेन 3डी शो के टीक्ट्स पहेले ही बुक कर लिए थे....फिल्म में मेरा पसंदीदा अभिनेता इरफ़ान ख़ान भी है ये सुनकर मैने भी उसही थियेटर में अपनी और अपने कुछ करीबी मित्रों के टीक्ट्स बुक कर लिए....और आख़िरकार हम बंगलोर के उर्वशी थियेटर के प्रांगड़ में थे...मैं और मेरे ऑफिस से करीब 24 और लोग. हम सब थियेटर के बाहर एकत्रित हुए...पार्किंग में खड़े वाहनो की कतार बता रही थी की फिल्म देखने आए हुए लोगों की संख्या बोहोत है...कुछ समये बाद सभी ने अपने-अपने 3डी ग्लासस लिए और थियेटर में प्रवेश किया....करीब 1161 सीट्स वाला ये सिनेमा हॉल खचा-खच भरा था, कुछ ही देर में हम सभी अपनी सीट्स पर थे....शोर इतना की अपनी आवाज़ भी चीखने के बाद खुद के कानों तक पोहोच रही थी. 3डी ग्लासस टूटने पर 2500/- रुपये जुर्माना होने की एक सूचना के बाद सलमान ख़ान की आने वाली फिल्म टाइगर का ट्रेलर शुरू हो गया...और शोर और ज़्यादा बढ़ गया...सलमान ख़ान के प्रेमी बंगलो...

"खुद से हुई एक मुलाक़ात"

आज तन्हा अकेला वक़्त मिला तो खुद को सोचने लगा, कहेते है जब आदमी अकेला होता है तो खुद के बोहोत करीब होता है, मौका सही था तो सोचा खुद से चार बातें कर लूँ, कुछ सवाल कर लूँ कुछ जवाब माँग लूँ, पर जब खुद को सामने रखा और बैठा...तो कुछ ना पाया...मैं भी चुप था और वो भी...सन्नाटा सा छा गया...मैं भी कुछ कहेने को ढूड़ रहा था और वो भी....ना कोई अल्फ़ाज़ मेरे पास था ना उसके पास, मानो एक पारदर्शी काँच की कोई सतेह हो मेरे सामने....जो होकर भी वहाँ नही था, बस मन व्याकुल हो उठा...सोचने लगा की ये क्या कर रहा हूँ मैं...वक़्त खराब तो नही कर रहा मैं इस बेफ़िजूली के काम में. फिर मैने उस परिस्थिति को नकार दिया, मैने उसे अनदेखा कर दिया जो मेरे सामने था...और राहत फ़तेह अली ख़ान जी के द्वारा गाया हुआ एक गाना गुनगुननाए लगा, मैने लगभग आधा गाना ख़तम कर दिया पर अभी भी वो चुप था...बस मुझे बिना किसी भाव के साथ देख रहा था...जैसे उसे कुछ सुनाई ही ना दे रहा हो...बहेरा हो...कुछ ना कह रहा था वो...मानो गूंगा भी हो...पर बस कुछ है वहाँ...मैं उसके आर पार देख सकता था...उसके पीछे कुछ नही छुप रहा था... मैं फिर चुप हो गया...और...

"गुड़िया"

एक गुड़िया की कहानी है ये, गुड़िया...जो किसी उम्मीद की गुलाम नही, जो सपनो की छोटी छोटी सी पर्चियाँ बनाकर, उनसे खेला करती है, इंद्रधनुष से रंग चुरा कर, ख्वाबों की तवीरें बनाती है ये गुड़िया, सूनेपन के साज़ पर गुनगुनाती, मुस्कुराती, अठखेलिया करती, अपने अरमानो की ठंडक में सिमटी, गर्म उजालों सी उजली, मैने अक्सर उसे फूंको से ज़ज्बात बुझाते देखा है, ज़िंदगी की धीमी सी मद्धम सी लॉ में मुस्कान के गर्म गर्म पोए पकते देखा है, एक ऐसी गुड़िया जो खामोसी में भी आवाज़ सुना करती है, चुप्पी से अल्फ़ाज़ बुना करती है, कल कल करती किसी नदी की एक तस्वीर, जिसकी गोद में सूरज भी शीतल हो विलीन हो जाता है, सूखे हुए दरख़्त के गर्त में, खिलती मुस्कुराती एक कली के जैसी, या आगन में सुबहा चढ़ती हुई धूप के जैसी, जिसके स्पर्श भर से ही, आगन की क्यारी में बंद मुरझाई पड़ी रिश्तों की कोंपलें खिल उठती हैं.

"चाह"

हमने कभी तारों से रौशन राह ना चाही थी, पर जिंदगी इस कदर भी काली स्याह ना चाही थी, कोयलों की कूक से आँखे चमकती थीं, गूँजती हमने किसी की आह ना चाही थी, सोचता था उलझनो से जूझ ही लूँगा, इस कदर उनकी नज़र बेपरवाहा ना चाही थी, गाओं की गलियों को छोड़ा गाओं जब छोड़ा, शहेर की हर एक सड़क गुमराह ना चाही थी आदतन जो पूछ बैठे हाल साहब का, शुक्रिया तो ना सही, दुत्तकार ना चाही थी.

नाम बताएँ आप का ?

ज़िक्र फिर हो चला है उसी बात का, मुस्कुराती हुई एक हँसी रात का, हम तमाशा हुए अपने जज़्बात का, हाल कैसे कहूँ ऐसे हालात का, बेफ़िज़ूली के आलम कही रह गये, अब मुसाफिर हूँ मैं अपने आगाज़ का, फिर उठाया है हुमको किसी शोर ने, आप आलम बताएँ गई रात का, खुद पे पहेरा लगाए हुआ क्या भला, सोच आज़ाद पंछी है आकाश का, कोई चर्चा नही सब हैं चुप क्यों भला. कोई भेद खोलो किसी राज़ का, जो हुआ बेदखल घर से रुसवा ना हो, आज घर हो चला आस्तीन साँप का, अपने होने का हुमको गुमाँ तब हुआ, जब पूंछा उन्होने "नाम क्या है आप का".

छोटी सी बात

क्यों छोटी सी बात लिए फिरता है तू, लम्हों की खैरात लिए फिरता है तू, पतझड़ में विकराल विटप ने भी अपने पत्ते त्यागे, सावन की सौगात लिए फिरता है तू, देखो क्या सैलाब उठा है, तिनका तिनका बह जाए, रिमझिम से ज़ज्बात लिया फिरता है तू, मतलब हो बेमतलब हो, उनकी रुतबा और हुआ, बिन बातों की बात लिए फिरता है तू, मतलब की दुनिया ये सारी, किसने किसके घाओ भरे, सीने पर आघात लिए फिरता है तू, क्यों छोटी सी बात लिए फिरता है तू

बुढ़िया

वो बुढ़िया आगन की तचती धूल में उकरू बैठी थी, घुटनो पर माथा टिकाया हुआ था, और दोनो हाथों के पंझो को मिट्टी में धाँस रखा था, रूखे पत्थर हो चुके हाथों को, वो काली मिट्टी की तचन भी, ठंडी बर्फ सी महेसूस हो रही थी, अपनी नाक से टपकते पसीने की बूँदों को गर्म सतेह पर गिर, पानी से भाप होते हुए देखती वो बुढ़िया, कुछ ही वक़्त में उन पसीने की बूँदों की तस्वीर बनने वाली थी, धुआँ होने वाली थी, पचानवे साल की पीठ तोड़ देने वाली उस उम्र के कितने ही टुकड़े हुए, पहेला टुकड़ा जब जन्म लिया और एक लड़की की देह धरी, दूसरा टुकड़ा आठ साल की उम्र में, जब लगन हुआ, और स्कूल बॅग, किताबों, दवात और कलम की जगह, तहेज़ीब, रीति, रिवाज टिका दिए गये उन कंधों पर ढोने के लिए, तीसरा टुकड़ा जब उम्र से पहेले ही गर्भ धरा, और चौथा जब अल्पविकसित जन्मी बcची की साँसों को, खटिया के मचवे तले दबा दिया गया, चार दीवारी में चॉखट से लटके पर्दों के पीछे से, धुंधली सी दुनिया को देखती वो दो आँखें भी धुँधला गयीं, चूल्‍हे पर धधकते लक्कड़ को बालते बालते, जिंदगी कब मोम सी पिघल गई पता ही ना चला, और एक दिन उन घुटनो ने दम तोड़ दिया, कूल्हे मे मची उस ...

'उलझन'

वो पतंग के माँझे सी उलझी उलझन, जितना भी सुलझाना चाहा उतनी ही और उलझ गई, क्या कहूँ उंगलियाँ औट कटवा बैठा, और एक दिन ऊभ कर पतंग के शॉक और उस डोर, दोनो से मैने तौबा कर ली, और मुड़कर फिर कभी, उन सीढ़ियों की ओर नही देखा जो छत तक जातीं थी, और अब कोई बसंत मेरे आगन नही आता, अब तो बस सन्नाटे गुनगुनाते हैं, पतझड़ मुस्कुराते हैं, अक्सर वो हुए पर सवाल तो उठते हैं, कुछ टूटे ख्वाब से घुट-ते हैं, जब भी यादों के धागों में कोई किस्सा पिरोता हूँ, तृष्णाओ के बीज फिर से बोता हुँ, तो बस क्या था, मैने खुद को कहीं रख दिया, और भूल गया, भूल गया वो सेहेर जिसका सूरज कभी कोई चहेरा होता था, भूल गया वो मेरे सुकून का दरिया तो तुझमें बेहेता था, और बन गया एक परछाई, जिसका कोई चहेरा ना था.

"जीना भी जंग सा"

ये जीना भी क्यों है जंग सा, खुद का ही ये लिबास, क्यों है मुझको तंग सा, बाबा की उलझन ध्यान दिया जाए ना, खुदा भी बदलता है अब तो रंग सा, उलझी सी उलझन, बेक़रार बेक़ारारी, हर दिल में छिड़ा है, गम और खुशी का रंज सा, सब साथ लिए बैठा क्या ढूड्ता है राही, मेरा "मैं" भी मुझसे दंग सा, है ये बुत्फक़ीरि, है या बुतपरस्ती, है समतल पे बैठा, कुआँ ढूड्ता है,, अजब है खुदाई का ढंग सा, ये जीना भी क्यों है जंग सा.

'वो तुम थे'

इस समाज की परंपराओं के, धारणाओ के, ना जाने कई बाँध लाँघे मैने, हौसला तुम थे, खुद से ना जाने, कई सौदे कई सवाल, और हुआ जो एक फ़ैसला, तुम थे, सुलगती खाहिशों ने मेरा दामन जला डाला, मेरी वो बेपरवाह ज़िद भी तुम थे, उस ज़िद की हद भी तुम थे, मेरी पथराई आँखों से अब बह चुका सागर, मुझे रोने की खाहिश थी, मगर कुछ अश्क कम थे, सिसकती चौखट वीरान, उड़े फरियाद के पंछी, ज़मीन पर जर्द पत्ते सा बचा एक नाम, हम थे.

ILLUSION of LIFE

नज़र से परे नज़र कुछ नही आता, बोहोत कुछ आता है, मगर हुमको कुछ नही आता, अपनी हसरत को इस उम्मीद में मीनार कर लिया, कुछ तो भाए गा, मगर हुमको कुछ नही भाता.

"बचपन"

आज सोचता हूँ, के एक उम्र वो थी, जहाँ हर् पल हस्ता था....हर् पल खिलखिलाता था..... कितना चैन, कितना सुकून..... मछली पकड़ने के कांटे....तो कभी कढाई वाली सुई का कितना जूनून, नानी जी के पानदान से सुपारी चुराना, वो मिटटी के टेलेफ़ोन से दिल लुभाना, पीपल के पत्तों पर चटकारे लेती...वो मटर की चाट, पोर के पास खटिया पर धीरे-धीरे सुलगती...वो जाड़ों की रात, आम के बाग़ में...सीपियों के पीछे भागते वो नन्हे कदम, चोपी और बबूल के काँटों के कुछ रिस्ते जखम, नदी के ऊपर मंडराती...टिटिहिरी की आवाजें, वो सपनों में होती...कोयल से बातें, छोटी सी बात पर यूँ सिसक कर रो देना, मिटटी लगे दो गालों को... आंसुओं से भिगो देना, वो बापू की बातों को गौर से सुनना, वो दाई का चावल से तिनकों को चुनना, खर्भुजाना के पेंड पर...तचती वो दोपहर, चाची की ठनकती थाली से...अंगडाई लेती वो सेहर, वो कुँए वाली बुढ़िया की...डरावनी सी बातें, डर के रजाई में सिमटती....वो ठंडों की रातें, वो प्यारी सी चिड़िया...वो गंदा सा बाज़, बग्गर में छुपे हुए...उन पिल्लों का राज़, और नदी वाले जंगल से आती....सियारों की आवाज़, गिट्टी फोड़, लापचुआ और गुट्टे का खेल, काज़...

"हर् कोई एक में ही तमाम मिलता है"....

हर् कोई एक में ही तमाम मिलता है, जहाँ भी नजर डाली, जमीं से जुडा हुआ एक आसमान मिलता है, गुनाहों पे उनके उन्हें बच्चा न बोलो, नादान सी बातों में सारा जहाँ मिलता है, आओ गाँव वालों अपनी फसलें बचाओ, ठाकुर जी का घोडा बेलगाम मिलता है, कितना पुकारा प्रभु तुम क्यों ना आये, हर् कोई जपता यहाँ राम-राम मिलता है .

" I " an Article

"I" I am right, I did not do anything wrong, I am this, I am that and God knows what. Almost everyone keeps living in this bubble of " I ", which they have created around themselves, sometimes this "I" finds itself on the last seat of the Bus, sometimes walking in the middle of the market, sometimes feeling shy being falling on the road, and sometimes this "I" is with Bus conductor when caught without ticket. SO many " I's "......" I " in every person. Every person tries to represent his " I " from with in his own limited sphere of thoughts, and actually this " I " pushes us to present our self to the surroundings. A mind evolving on the bases of some orthodox definitions, which have created the structure of our society, always finds it very difficult to see beyond these high walls. For an Example:- A potter gives a Pot its shape and from this shape it gets its definition, and its called...

"दिल के बोल"

देखो जिंदगी ख़ाक हुई ना, फिर वोही बात हुई ना, एक रिश्ते से खिलवाड़ किया, जो टूटा तो आवाज़ हुई ना, माना के वो दिन गुलशन थे, अब् पतझड़ हर् एक रात हुई ना, दिल-ए-नादाँ को सुकून मिला ना, बेचैनी बिन बात हुई ना, ना कुछ सोचा ना कुछ भाला, एक चिंगारी से आग हुई ना, एक हाड़ मॉस की लड़की को, तुम खुदा नवाज़ा करते थे, लो अब् वोही जल्लाद हुई ना।