संदेश

" I " an Article

"I" I am right, I did not do anything wrong, I am this, I am that and God knows what. Almost everyone keeps living in this bubble of " I ", which they have created around themselves, sometimes this "I" finds itself on the last seat of the Bus, sometimes walking in the middle of the market, sometimes feeling shy being falling on the road, and sometimes this "I" is with Bus conductor when caught without ticket. SO many " I's "......" I " in every person. Every person tries to represent his " I " from with in his own limited sphere of thoughts, and actually this " I " pushes us to present our self to the surroundings. A mind evolving on the bases of some orthodox definitions, which have created the structure of our society, always finds it very difficult to see beyond these high walls. For an Example:- A potter gives a Pot its shape and from this shape it gets its definition, and its called...

"दिल के बोल"

देखो जिंदगी ख़ाक हुई ना, फिर वोही बात हुई ना, एक रिश्ते से खिलवाड़ किया, जो टूटा तो आवाज़ हुई ना, माना के वो दिन गुलशन थे, अब् पतझड़ हर् एक रात हुई ना, दिल-ए-नादाँ को सुकून मिला ना, बेचैनी बिन बात हुई ना, ना कुछ सोचा ना कुछ भाला, एक चिंगारी से आग हुई ना, एक हाड़ मॉस की लड़की को, तुम खुदा नवाज़ा करते थे, लो अब् वोही जल्लाद हुई ना।

ग़ज़ल

हमको ये रिश्ते निभाने नहीं आते, इन आँखों को झूट छुपाने नहीं आते, कितना भी थामों फ़साने छूट जाते हैं, इन होठों को जाल बिछाने नहीं आते, हमने नयी रस्मों को ढोया बोहोत है, क्यों लौट कर रिश्ते पुराने नहीं आते, तकदीर में मेरी राह वो क्यों लिखी, जिस राह से लौट कर दीवाने नहीं आते, कुछ सोचा समझा और बस इनकार कर दिया, यूँ रेत के घर हमें बनाने नहीं आते, महेफिल में हमको ताकती नजरें, कुछ पल ठहर कर गुज़र गयीं, इन नज़रों को तीर के निशाने नहीं आते, इस कशमकश के भवर में कब तक रहोगे, क्यों तैर कर दरिया किनारे नहीं आते।

"मेरे दोस्त"

तुम सब हो तो बहाना है, वक़्त के दामन से एक मुस्कान चुरा लूँ, जिंदगी के इस मोड़ से गुजरते हुए, एक छोटा सा मीठा सा किस्सा उठा लूँ, ये धीरे धीरे जलती जिंदगी की लौ में, लम्हे मोम की तरह पिघलते हैं, कितना भी थामों इन्हें, हाथों से रेत की तरह फिसलते है, हाथों से फिसलती इस रेत का, एक छोटा सा यादों का घर ही बना लूँ, तुम सब हो तो बहाना है, वक़्त के दामन से एक मुस्कान चुरा लूँ।

ग़ज़ल

बेवजह बिंबात कोई गम सा है, हर् लम्हा भीगा सा है, हर् लम्हा नम सा है, आरजुओं के बादल ,रह रह कर घिर आतें हैं, कितना कुछ है, फिर भी कम सा है, नजर फकीर की देखा, तो सब हमशक्ल दिखते हैं, वो कोई गैर भी, हूबहू हम सा है, खिलाड़ी ताश के पत्तों को कुछ ऐसे घुमाता है, तमाशाई इन्सान, कभी बदिश, कभी गुल्लू, कभी दुक्की, कभी बेगम सा है।

ग़ज़ल

हाँ मुझे गुमनाम रहेने दो, इस शक्शियत को आम रहेने दो, इन खाहिशों के दलदलों ने दम निकाला, बस अब् कोई आगाज़ रहेने दो, अब् कोई अंजाम रहेने दो, इंसानियत काफी, खुदा बनकर क्या करना, तुम बस मुझे इन्सान रहेने दो, हमने आधी उम्र भर सूरज उठाया है, अब् कुछ दिनों की शाम रहेने दो।

"बेबस उजाले" ग़ज़ल

उजाले बेबस से हैं अँधेरे गाँव में, धुप नहीं रिसती जाड दरख्तों की छाओं में, बे-क्स परिंदे सय्याद के हमनफस हो बैठे, ये कौन सा रंग बिखरा है आबो-फिजाओं में, फरमान-ए- क़त्ल-ए-आम को एहेतेसाब कौन करे, खुदा-ए-वलायत जो ठेहेरी, बड़े शौक से क़त्ल होतें हैं, क्या खूब तिलिस्मियत है उनकी निगाहों में।

तिनका

हर् रोज़ कुछ सोचता हूँ, हर् रोज़ कुछ पन्ने भरता हूँ, इस गुमनाम माहौल को नाम देती कुछ लकीरें हर् रोज़ पन्नों पर खिचती हैं, कभी यूँ ही बैठे हुए कहीं किसी बस स्टॉप पर खड़े कुछ धुन्द्लाये से चहरे याद आ जाते हैं, तो कभी फुटपाथ पर भागते हुए कुछ क़दमों की आहट घर की सीढियों पर दौड़ जाती है, कभी फ़ोन पर कुछ पुराने दोस्तों से बात करते हुए आज की कुछ नई बातें होटों पर मचल उठतीं हैं, तो कभी रात खाब में कुछ बीती हुई बातें पलकों पर बिजली के जैसे कौंध जाती हैं, कभी कोई बात हुई तो हलकी सी मुस्कान छिटक जाती है चहरे पर, तो कभी किसी मंजर से दिल घबरा उठता है। साथ के कुछ नए चेहेरों के साथ बैठ कर अक्सर यूँ ही बिन्बात हसना, तो कभी मिले वक़्त कमरे के किसी कोने में बैठ कर कुछ अपनों को याद कर रोना और मुस्कुराना, बस यूँ ही हर् दिन गुजरता है, वक़्त की बहेती हवाओं के साथ किसी सूखे हुए तिनके की त रा बस बह रहा हूँ, हज़ारों सवालों के साथ, बेचैन अकेला, यूँ तो सहारा है कुछ अपनों का, और कुछ ख्वाब साथ हैं, जो अपने होकर भी अपने नहीं, जो पास होकर भी पास नहीं, एक धुंदली सी उम्मीद है इन निदासी आखों में, जो आगे चलने को मजबूर सा ...

अब् मुझे कोई इंतज़ार कहाँ

रूखे से होंटों पर कोई बात भटकती है, उनके पेहेलू में गई वो रात खटकती है, बरसों बीते फिजाओं का कोई ख़त न आया, गुलदानो में अब् ख़ाक महेकती है, फर्श पर गिर के कोई किस्सा टूटता सा है, खिड़की के शीशों पे जब भी कोई आह चटकती है, मौसम भी सावन की बूँदें भूल गया, आगन में बस धूप बरसती है, पंछी भी इस चौखट से रुसवा रुक्सत, मुंडेरों पर कोई तीस केहेक्ति है, रूखे से होटों पर कोई बात भटकती है।

पत्थर के साए

वो साए पत्थर के थे, दरारों से धुप छलकती थी, झुलसी हुई सी छाओं में, एक चिड़िया बिलकती थी, अधूरे से मौसम थे वहां, उनकी बातें भी झूटी थीं, कभी तेज़ाब सी बारिश तो कभी चिलकती धुप में, उस घर की छतें टूटी थीं, उस दर की हालत जार थी, वो चौखट सुलगती थी, झुलसी हुई सी छाओं में, एक चिड़िया बिलकती थी, उस वक़्त की चोली से, थमता कहाँ खुशियों का दामन, एक पाओं भी आ सके, छोटा सा आगन, थी सिसकियाँ ठेहेरी सी, हर् आह पलट ती थी, झुलसी हुई सी छाओं में, एक चिड़िया बिलकती थी, साहिल ही जैसे सिमट के, क़दमों पे आ पड़ा, दो बूँद पानी भी नहीं, सूखा घड़ा, इच्छाएं जैसे बर्फ हों, जमके पिघलती थीं, झुलसी हुई सी छाओं में, एक चिड़िया बिलकती थी।
हर रोज़ मुझे वो मिलता है, हर भोर भये, हर सांझ भये, वो सूरज की किरनी में घुल, मेरे चहरे पर खिलता है, हर रोज़ मुझे वो मिलता है, कभी-कभी जब डर जा ऊं , खुद को तनहा, वीरान पा ऊं, तो बच्चों की मुस्कानों में, गलियों में नन्हे पाओं लिए, वो ठुमक ठुमक कर चलता है, हर रोज़ मुझे वो मिलता है, है धरा वहीँ, आकाश वहीँ, क्यों हाथों तेरा हाथ नहीं, सूखे होंठों को प्यास नहीं, है कल कल सागर पास यहीं, व्याकुल तृष्णा, बेचैन ह्रदये, जब त्रिषण आग में जलता है, तब स्वर्णिम तेरा आँचल ही, हर लहर लहर में हिलता है, हर रोज़ मुझे वो मिलता है।
कांच के जैसे कुछ सपने थे, कांच के जैसे टूट गए, उनकी तेज़ी तूफानी थी, हमतो पीछे छूट गए, उची हस्ती, राज़ है उनका, दरबारों में धूम रहे, लोगो को चोरों ने लूटा, हमको राजा लूट गए, हमने कैसे जेहर पिया है, मुश्किल से दो घुट गए, पत्थर से अरमा भिड बैठे, अरमा के सर फूट गए, ऐसी नादानी की हमने, बच्चा कोई भूल करे, उस दामन से जा उलझे हम, जिस दामन में शूल भरे।
हैं पैर, घिसट के चलता है, तू काफिर मुझ पर हस्ता है, क्या कदमो को मालूम नहीं, है कौन गली क्या रास्ता है, सब सूनसान खामोश पड़ा, ये किन गूगों का दस्ता है, कोई चोर घुसे तब बस्ती का, हालत बड़ा ही खस्ता है, सब कुछ देखा भला उसका, वो भोला भला बच्चा है, कुछ तो बदलू उम्मीद लिए, वो रोज़ कमर को कसता है ।

खाबों की दस्तक

रात कुछ बीते हुए लम्हों की दस्तक पर किवाड़ खोले तो दिन भर की थकान से चूर बुझी हुई सी पलके कांप गईं , बीते लम्हों ने कांधे से एक गठरी को उतार कर चौखट के इस पार रखा और गाँठ खोल दी, गठरी में न जाने कितनी ही यादें भरी हुई थीं, बीते लम्हे उन पतझड़ के सूखे हुए पत्तों की महक और रुंदन लाये थे, जिन्हें कभी लोन में टेहेल ते हुए यूँ ही कुछ मीठी बातो ने अनजाने में नंगे पाओं तले रौंदा था, बीते लम्हों ने मल्हार में भीगी हुई सुनसान सडको की वो ठंडक मेरे पैरों के आगे उड़ेल दी, जिस ठंडक को कभी मैंने तुम्हारी बाहों में बाहें ड़ाल कर कुछ कदम चल महसूस किया था, बीते लम्हे नदी के एक छोर पर ढलती एक शाम और कुछ गीत लाये थे, जो तुमने मेरे नाम पर लिखे और गुनगुनाये थे, बीते लम्हे आम के बाग़ में उस बचपन की अंगड़ाई, किलकारियां और उन शाखों का कम्पन लाये थे, जिन शाखों से हमने न जाने कई सीपियाँ तोड़ी, सोती हुई पलकों से खाब रिसना शुरू हुए तो आँख खुल गई, पलकों से खाब अभी भी रिस रहे थे, चादर को कसकर पकडे हुए उँगलियों की जकड़न, मनो उन लम्हों का आँचल पकडे हुए थीं, आँखे बेचैन, अँधेरे में इधर उधर ताकने लगीं, फिर मेरा वर्तमान कम...

तसल्ली नही

हुआ एक अरसा तसल्ली नही, ये अरमां ये दुनिया तसल्ली नही, ये होनी के होने में ऐसे फसे, जो ऐसा हुआ तो तसल्ली नही, जो वैसा हुआ तो तसल्ली नही, खुली आँख झपकी धुआं उड़ चला, ये खाबों का कोहरा तसल्ली नही, ये रिश्तो की भाषा अजब हो गई, कोई हाथ छोड़े तसल्ली नही, कोई हाथ थामे तसल्ली नही, मिला एक साहिल न ठहेरा कभी, वो दूजा खड़ा है तसल्ली नही, इस तूफा में राही को क्या घर दिखा, जो साया मिला तो तसल्ली नही, जो ना मिल सका तो तसल्ली नही, देखो नादा जूते के फीते कसे, कई गाँठ गांठी पतंगे उड़ीं, कोई गाँठ छु टी तसल्ली नही, उन भूखो की चर्बी कहाँ तक चले, ये भेली का धेला, जो तेरा हुआ तो तसल्ली नही, जो मेरा हुआ तो तसल्ली नही।
तेरा नखरा कहूँ क्यों शूल सा है, ये दिल हमारा नाजुक सा है, फूल सा है, पुरवा में पश्चिम की ओर कदम ले मुट्ठी में भर-भर के उडाते हो, हमारा मुकद्दर तुम्हारे हाथों से उड़ती धूल सा है, मैं अपनी सुना_सुना के थक गया, वो सुनता ही नहीं, वो इस दुनियादारी में बड़ा मशगूल सा है, थक के गिर ही पड़ा मैं तो पीछे हटा, वो न जाने किस तलब में तूल सा है, जब गुजर ही गया अपने अंजाम से, अब नज़र आ रहा है की मेरे हाथों में ये क्या भूल सा है।
क़द्र थोडी करो इतनी अच्छी नही, छवि सयानी हुई अब वो बच्ची नहीं, क्या हुआ जो गिरी उसको ठोकर लगी, इस शेहेर की जो सड़कें हैं अच्छी नहीं, पवन पुत्रों का युग कोई सतयुग हुआ, आज आवोहवा से दुपट्टा उड़ा, उसकी गलती नहीं, उफ़ ये १६ वीं सदी के विचारों की गठरी, इसको नीचे धरो, सदी २१ वीं हुई अब ये काँधे तुम्हारे फलतीं नहीं, क्यों गला फाड़ते हो कोई सुनता नहीं, आज तुम जैसों की कोई चलती नहीं, आज पानी यही हर बदन को लगा, एक तुम्हारी ही दाल गलती नहीं, कितना रौशन हुआ शब्-ऐ-माहौल है, क्यो तुम्हारे ही घर में बिजली नही, सूखे तिनके घरौंदों के चुभने लगे, इनको माचिस लगाओ स्वाहा करो, आज इच्छाओं का है ठिकाना कहीं, उन सूखे घरौंदों में पलती नहीं।

"मैं"

मैं सही हूँ, मैंने कुछ ग़लत नही किया, ये मेरी सोच है, मैं ये हूँ, मैं वो हूँ और न जाने क्या-क्या। हम में से बोहोत हद तक लोग इस "मैं" ही जीते हैं, कभी बस में पीछे की सीट पर बैठा हुआ एक "मैं", कही बाज़ार में संभल के चलता एक "मैं" ,सड़क पे लडखडा के गिर पड़ने पर सेहेमता और शर्माता "मैं", तो कभी बिना टिकेट के पकड़े जाने पर बस कंडेक्टर से लड़ता "मैं", हर इन्सान में एक "मैं" । हर कोई अपने सीमित सोच और विचारों के दायेरे में ही अपने अस्स्तित्व को परोसता है, एक "मैं" ही हमें हर पल धक्का देता है ख़ुद को प्रस्तुत करने के लिए। कई महान हस्तीयों के उदाहरण, और हमारे समाज का रचित ढाचा, जो जीवन की कुछ बेसिक परिभाषाओं पर टिका है, में पनपता मस्तिष्क जिसका अंकुरण कुछ इन्ही बेसिक परिभाषाओं में होता है, इस समाज के रचित ढाचे के अनुसार ही ढलना शुरू होता है, अब इनसे परे देख पाना किसी भी साधारण के लिए बोहोत मुश्किल है। बोहोत ही साधारण सा उदाहरण-(कुम्हार एक मटके को मटके का आकार देता है तो वो मटका कहेलाता है )। "मैं" इस रचित ढाचे का ही ए...
उनका आँचल जो कभी ठिया था, हमारा मुकद्दर भी कभी जिया था, कई नज़मो को का ता हमने, कई फुलकारियों को सिया था , हर ख्वाब को सच करने की ज़हेमत उठाई, अजीब लेहेजा था उन मिया का, यूँ ही एक दफा नींद में, वक्त के परिंदों को वश में किया था, पुर असरार (संदेह से भरी हुई) नज़र, महाशर(क़यामत लाने वाली ) थी, उनकी हर अदा पे हर कुछ तस्लीम(दाओ पे करना ) किया था, वो खुदा, तो रूह आफजा थी, आज रंग इंसानी है उस खुदा का .

ग़ज़ल

वक्त तपता रहा पाओं जलते रहे, जैसी सड़कें मिलीं वैसे चलते रहे, कई सौदे किए दिल की आवाज़ से, कोई इरफान थे कोई बनते रहे, भीड़ में ही खड़ा एक इंसान हूँ, ख्वाब जलते रहे ख्वाब पलते रहे, जिंदगी का बड़ा ही अजब खेल है, वो उलझती रही, हम सुलझते रहे, शेर-ऐ-शाहे सवार की फित्त्रत रही, कई धक्कों से गिर के सम्हलते रहे, तुझसे शिकवा नही कुछ शिकायत नही, ये तो अरमान हैं बस मचलते रहे।